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…तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

पाश को पढ़ना और फिर-फिर पढ़ना अपने समय के प्यार और अपने समय की नफ़रतों को जानने की तरह है. वे कुछ उन कवियों में शामिल हैं, जिन्हें बार-बार पढा़ जाना ज़रूरी हो गया है-नेरुदा, ब्रेष्ट और मुक्तिबोध की तरह. हमारे देश में जहां अंधेरा इतना घना है और उजाले की लडा़ई भी उतनी ही सघन, पाश लिजलिजे हिंदी लेखकों और कवियों से कहीं ऊपर इस लडा़ई में और इस अंधेरे के खिलाफ़ हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं. वे हमारे समय के लोर्का हैं. उनकी संपूर्ण कविताएं हिंदी में अनूदित होकर कुछ साल पहले प्रकाशित हुई हैं. प्रस्तुत हैं कुछ कविताएं. हम कोशिश कर रहे हैं-पाश पर कुछ और सामग्री देने की.

पाश की कविताएं

हम लडेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है
उदास निहाई पर हल की लीकें
अब भी बनती हैं, चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता, सवाल नाचता है
सवाल के कंधों पर चढ़ कर
हम लड़ेंगे साथी.

कत्ल हुए जज्बात की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़ी गांठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
कि बीरू बकरिहा जब तक
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूलों को
बीजनेवाले जब तक खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखोंवाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
जंग से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला दबाने के लिए विवश हैं
कि बाबू दफ्तरों के
जब तक रक्त से अक्षर लिखते हैं…
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है…

जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी…
हम लड़ेंगे
कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अभी तक लड़े क्यों न
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जानेवालों
की याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी…

तीसरा महायुद्ध

कचहरियों के बाहर खड़े
बूढ़े किसान की आंखों में मोतियाबिंद उतर आयेगा
शाम तक हो जायेगी सफेद
रोजगार दफ्तर के आंगन में थक रही ताजी उगी दाढ़ी
बहुत जल्द भूल जायेगा पुराने ढाबे का नया नौकर
अपनी मां के हमेशा ही धुत्त मैले रहनेवाले
पोने की मीठी महक
ढूंढ़ता रहेगा किनारे सड़क के वह निराश ज्योतिषी
अपने ही हाथ से मिटी हुई भाग्य रेखा
कार तले कुचले गये और पेंशन लेने आये
पुराने फौजी की टूटी हुई साइकिल
तीसरा महायुद्ध लड़ने की सोचेगी

तीसरा महायुद्ध
जो नहीं लड़ा जायेगा अब
जर्मनी और भा़डे के टट्टुओं के बीच
तीसरा महायुद्ध सीनों में खुर रही
जीने की बादशाहत लड़ेगी
तीसरा महायुद्ध गोबर से लिपी
छतों की सादगी लड़ेगी
तीसरा महायुद्ध कमीज से धुल न सकनेवाले
बरोजे की छींटे लड़ेंगीं
तीसरा महायुद्ध
पेशाब से भरी रूई में लिपटी कटी हुई उंगली लड़ेगी

जुल्म के चेहरे पर चमकती
बनी-संवरी नजाकत के खिलाफ
धरती को कैद करना चाहते चाबी के छल्ले के खिलाफ
तीसरा महायुद्ध
कभी न खुलनेवाली मुट्ठी के खिलाफ लड़ा जायेगा
कोमल शामों के बदन पर रेंगनेवाले
सेह के कांटों के खिलाफ लड़ा जायेगा
तीसरा महायुद्ध उस दहशत के खिलाफ लड़ा जायेगा
जिसका अक्स दंदियां निकालती मेरी बेटी की आंखों में है,
तीसरा महायुद्ध
किसी फटी-सी जेब में मसल दिये गये
एक छोटे से संसार के लिए लड़ा जायेगा.

लड़े हुए वर्तमान के रू-ब-रू

मैं आजकल अखबारों से बहुत डरता हूं
जरूर उनमें कहीं-न-कहीं
कुछ न होने की खबर छपी होगी
शायद आप जानते नहीं, या जानते भी हों
कि कितना भयानक है कहीं भी कुछ न होना
लगातार नजरों का हांफते जाना
और चीजों का चुपचाप लेटे रहना-किसी ठंडी औरत की तरह

मुझे तो आजकल चौपालों में होती गपशप भी ऐसी लगती है
जैसे किसी झूमना चाहते वृक्ष को
सांप गुंजलक मार कर सो रहा हो
मुझे डर है खाली कुरसियों की तरह कम हुई दीखती
यह दुनिया हमारे बारे में क्या उलटा-पुलटा सोचती होगी
अफसोस है कि सदियां बीत गयी हैं
रोटी, काम और श्मशान अब भी समझते होंगे
कि हम इनकी खातिर ही हैं…
मैं उलझन में हूं कि कैसे समझाऊं
लजीले सवेरों को
संगठित रातों और शरीफ शामों को
हम कोई इनसे सलामी लेने नहीं आये
और साथ-को-साथ जैसा कुछ कहां है
जो आलिंगन के लिए खुली बांहों से
बस हाथ भर की दूरी पर तड़पता रहे
आजकल हादसे भी मिलते हैं तो ऐसे
जैसे कोई हांफता हुआ बूढ़ा
वेश्या की सीढ़ी चढ़ रहा हो
कहीं कुछ इस तरह का क्यों नहीं है
जैसे किसी पहली को कोई मिलता है

भला कहां तक जायेगा
सींगोंवाली कब्र के आगे दौड़ता हुआ
महात्मा लोगों का वरदान दिया हुआ यह मुल्क
आखिर कब लौटेंगे, घटनाओं से गूंजते हुए घरों में
हम जीने के शोर से जलावतन हुए लोग
और बैठ कर अलावों पर कब सुनेंगे, आग के मिजाज की बातें
किसी-न-किसी दिन जरूर अपने चुबंनों से
हम मौसम के गालों पर चटाख डालेंगे
और सारी-की-सारी धरती अजीबो-गरीब अखबार बनेगी
जिसमें बहुत कुछ होने की खबरें
छपा करेंगी किसी-न-किसी दिन.

अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये
आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हमारे समयों में

यह सब कुछ हमारे ही समयों में होना था
कि समय ने रूक जाना था थके हुए युद्ध की तरह
और कच्ची दीवारों पर लटकते कैलेंडरों ने
प्रधानमंत्री की फोटो बन कर रह जाना था

धूप से तिड़की हुई दीवारों के परखचों
और धुएं को तरसते चूल्हों ने
हमारे ही समयों का गीत बनना था

गरीब की बेटी की तरह बढ़ रहा
इस देश के सम्मान का पौधा
हमारे रोज घटते कद के कंधों पर ही उगना था
शानदार एटमी तजर्बे की मिट्टी
हमारी आत्मा में फैले हुए रेगिस्तान से उड़नी थी

मेरे-आपके दिलों की सड़क के मस्तक पर जमना था
रोटी मांगने आये अध्यापकों के मस्तक की नसों का लहू
दशहरे के मैदान में
गुम हुई सीता नहीं, बस तेल का टिन मांगते हुए
रावण हमारे ही बूढ़ों को बनना था
अपमान वक्त का हमारे ही समयों में होना था
हिटलर की बेटी ने जिंदगी के खेतों की मां बन कर
खुद हिटलर का डरौना
हमारे ही मस्तकों में गड़ाना था

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था

बहुत दफा, पक्के पुलों पर
लड़ाइयां हुईं
लेकिन जुल्म की शमशीर के
घूंघट न मुड़ सके
मेरे यारो, अकेले जीने की ख्वाहिश कोई पीतल का छल्ला है
हर पल जो घिस रहा
न इसने यार की निशानी बनना है
न मुश्किल वक्त में रकम बनना है

मेरे यारो, हमारे वक्त का एहसास
बस इतना ही न रह जाये
कि हम धीमे-धीमे मरने को ही
जीना समझ बैठे थे
कि समय हमारी घड़ियों से नहीं
हडि्डयों के खुरने से मापे गये

यह गौरव हमारे ही समयों को मिलेगा
कि उन्होंने नफरत निथार ली
गुजरते गंदलाये समुद्रों से
कि उन्होंने बींध दिया पिलपिली मुहब्बत का तेंदुआ
और वह तैर कर जा पहुंचे
हुस्न की दहलीजों पर

यह गौरव हमारे ही समयों का होगा
यह गौरव हमारे ही समयों का होना है.

बेदखली के लिए विनयपत्र

मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें
मैं खूब जानता हूं नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खानों,भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा एक कोना था
जहां पहली बार
जब दिहाड़ी मजदूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक्त था
जब इस कत्ल की साजिश रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं खोज पायेगी इस साजिश की जगह
क्योंकि ट्यूबें सिर्फ राजधानी में जगमगाती हैं
और खेतों, खानों व भट्ठों का भारत बहुत अंधेरा है

और ठीक इसी सर्द अंधेरे में होश संभालने पर
जीने के साथ-साथ
पहली बार जब इस जीवन के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने खुद को इस कत्ल की साजिश में शामिल पाया
जब भी वीभत्स शोर का खुरा खोज-मिटा कर
मैंने टर्राते हुए टिड्डे को ढूंढ़ना चाहा
अपनी पुरी दुनिया को शामिल देखा है

मैंने हमेशा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित की छाती में ढूंढ़ कर
अगर उसके कातिलों को इस तरह सड़कों पर देखा जाना है
तो मुझे भी मिले बनती सजा
मैं नही चाहता कि सिर्फ इस आधार पर बचता रहूं
कि भजनलाल बिशनोई को मेरा पता मालूम नहीं

इसका जो भी नाम है-गुंडों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं
मैं उस पायलट की
चालाक आंखों में चुभता भारत हूं
हां मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.

भारत

भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी प्रयोग किया जाये
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
राष्ट्रीय एकता की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है-
उसकी टोपी हवा में उछाल दूं
उसे बताऊं
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहां अन्न उगता है
जहां सेंध लगती है…

और अंत में

तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक ज़िंदगी में डूबना चाहता था.
मेरे हिस्से का जी लेना मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का जी लेना.

(मैं अब विदा लेता हूं से)

मूल पंजाबी से अनुवाद : चमनलाल

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श्रेणी:कविताएं, पाश
  1. Udan Tashtari
    अक्टूबर 30, 2007 को 7:30 अपराह्न

    साधुवाद!!पाश की कवितायें पेश करने के लिये बहुत आभार.

  2. आशीष
    अक्टूबर 31, 2007 को 8:16 पूर्वाह्न

    कल ही रात को पाश की कविता पढी…और आज सुबह अपने पढ़ा दी…शुक्रिया इसके लिए

  3. rajnish
    अक्टूबर 31, 2007 को 9:10 पूर्वाह्न

    bahut deen baad pash ki kavita pari. dhanyavad. ek aur kavita dal dijiye- lahoo hai ki tab bhi gata hai.rajnish.

  4. Sanjeet Tripathi
    अक्टूबर 31, 2007 को 10:10 पूर्वाह्न

    शुक्रिया!!

  5. अजित
    नवम्बर 1, 2007 को 4:17 अपराह्न

    शुक्रिया । घर में दीवाली पूर्व की सफाई चल रही है। बैठक में लगा पोस्टर ‘हम लड़ेंगे साथी…..’ पर जमी कुछ धूल साफ की जा चुकी है। पोस्टर हाथ से छूट जाता है। एक कोना फट जाता है, सेलोफेन उखड़ चुका है। जतन से उसकी मरम्मत कर वापस दीवार पर टांग देता हूं। अच्छी कविताएं पढ़वाने का एकबार फिर शुक्रिया।

  6. Amit
    मार्च 26, 2009 को 7:07 पूर्वाह्न

    खो गया था मेरा वो पोस्टर जिस पर पाश की आग लहराती थीजहाँ बीरू बकरिहा अब भी पेशाब पीता हैलेकिन मिल गया आज एक बार फिरवही नज़्म जिसे गुनगुनाकरएक बार फिर से जलाऊँगा मैं मोदी की लंका |

  7. Amit
    मार्च 26, 2009 को 7:10 पूर्वाह्न

    http://aawaaz.wordpress.com/may be we can talk something not-so-important..

  8. अमित आज़मगढ़
    जून 7, 2014 को 7:26 अपराह्न

    हम लड़ेंगे साथी!

  1. जून 23, 2015 को 7:39 अपराह्न

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